धर्म क्या है| धर्म की सीधी और सरल परिभाषा

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हमें अक्सर ईश्वर की पूजा करने उनके आगे सर झुकाने को कहा जाता है। पर वास्तव में धर्म क्या है? इस बात को न तो हमारे माता पिता, और न ही कोई स्कूल या शिक्षण संस्थान स्पष्ट तौर पर समझाते हैं।

धर्म क्या है

धर्म कैसे हमारी समस्याओं को खत्म कर सकता है? ये प्रश्न अगर कभी किसी इंसान मन में आते भी हैं तो फिर उसे इनका सीधा और सरल जावाब नहीं मिल पाता, हालाँकि धर्म के विषय को अनेक धार्मिक गुरुओं ने भिन्न भिन्न तरीकों को समझाने की कोशिश की है!

पर आज हम धर्म का सटीक और सही मतलब इस लेख में समझेंगे, अतः ध्यानपूर्वक इस लेख को पढ़ें ये लेख आपके जीवन को नयी दृष्टि देने में मददगार साबित होगा!

धर्म क्या है| धर्म की परिभाषा

धर्म से तात्पर्य एक ऐसी धारणा अपनाने से है जो तुम्हें बाकी अन्य धारणाओं को मानने से मुक्ति दे दे, अर्थात जो धारण करने योग्य हो सिर्फ वही धर्म है। धर्म हमें बाकी सभी धारणाओं से आजाद करता है और जो सही है उचित है उसे करने की अनुमति देता है।

सरल शब्दों में कहें तो जिस समय जो कार्य करना सबसे उचित है वही धर्म है। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति बीमार है उसे दवाई की सख्त जरूरत है तो आप सब जरूरी कार्यों का त्याग करके उस तक दवाई पहुंचाएं यही आपका धर्म होगा।

धर्म कोई रुढ़िवादी मान्यता नहीं है जो हमें बताता है कौन से काम करने चाहिए कौन से नहीं? अपितु धर्म हमें उस क्षण, उस पल वह कर्म करने के लिए कहता है जिसे करना हमारे लिए अति आवश्यक है!

गीता के अनुसार धर्म क्या है?

गीता के अनुसार सब धर्मों का त्याग करके सत्य को जीवन समर्पित करना ही धर्म है!

धर्म क्या है गीता के अनुसार

महाभारत के युद्ध में धनुर्धारी अर्जुन यह जानते हुए भी की कौरवों ने अधर्म का साथ देकर हमारे साथ अन्याय किया है।

 उसके हाथ दुष्ट कौरवों यानी भाइयों को मारने के लिए काँप रहे हैं, उसका गला सूख रहा है और दूसरी तरफ कृष्ण उसे समझा रहे हैं की इस समय युद्ध करना ही तेरा धर्म है।

गीता में कृष्ण अर्जुन को युद्ध के मैदान में कहते हैं तुम सब धर्मों का त्याग करके मेरी शरण में (सत्य की तरफ) आओ, यही धर्म है।

अर्जुन जब तक तुम ये याद किए बैठे हो की तुम एक क्षत्रिय हो, भाई हो, पिता हो, बेटे हो तब तक तुम धर्म के लिए युद्ध नहीं कर पाओगे।

और फिर अंततः गीता के 18 अध्यायों को सुनने के बाद अर्जुन को कृष्ण की बात समझ आती है और फिर वह युद्ध करने के लिए तैयार होते हैं और कौरवों से यह महायुद्ध जीत पाते हैं!

धर्म हमें क्या सिखाता है?

धर्म इंसान को सीख देता है की उसकी एकमात्र निष्ठा सत्य के प्रति होगी, लेकिन जब तक एक इंसान अपनी पहचान को पकडे होता है तब तक उसका कोई धर्म नहीं हो सकता।

उदहारणस्वरूप आप एक पिता हैं, एक स्त्री हैं, बेटे हैं, बहन हैं इत्यादि आपने अगर स्वयं को कुछ भी मान रखा है तब तक आप सिर्फ अपनी पहचान के खातिर ही कार्य करेंगे, धर्म के लिए नहीं!

परन्तु धर्म हमें हमारी इस पहचान यानि जिसे हम मैं बोलते हैं, जिसके इस दुनिया और समाज के साथ तरह तरह के रिश्ते हैं।

जिन रिश्तों के खातिर वो बुरे और गैर जरूरी कार्यों को करता है उस मैं से ही मुक्ति अगर पानी है तो धर्म ही इसका अंतिम उपाय है!

धर्म आपको सब धारणाओं से मुक्ति देकर सिर्फ सत्य और इमानदारी के लिए जीवन जीने हेतु प्रेरित करता है,

सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है ?

धर्म के मार्ग में यानि सत्य पर जीवन जीना ही, सबसे बड़ा कर्तव्य है। एक व्यक्ति का कर्तव्य अपने बेटे, बच्चों या रिश्ते में अन्य किसी व्यक्ति की सेवा करने, उनकी इच्छाओं की पूर्ती करना नहीं होता।

 इसे आप आसान शब्दों में समझें कहें तो जो करना चाहिए, जो सबसे उपेक्षित है सिर्फ वही कर्तव्य मात्र है!

 इन्सान को अन्य शब्दों में “मैं” से मुक्ति पाना ही इन्सान का सबसे बड़ा कर्तव्य है। क्योंकि अगर मन में जब तक अहंकार यानि मैं भाव हैं तो वह जो भी कार्य करेगा वह इसलिए ताकि उसे कुछ लाभ और शांति मिल सके।

इसलिए संतों ने,ऋषियों ने इस मै भाव को मिटाने पर जोर दिया है ताकि हम धर्म के मार्ग पर चल सके!

लोग धर्म के रास्ते पर क्यों नहीं चल पाते हैं?

श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने पर हम पाते हैं की धर्म के रास्ते पर चलने के लिए जीवन बदलना पड़ता है। हम वो लोग हैं जो छोटी छोटी बातों पर अपना स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, बेईमानी का जीवन जीते हैं हमारे लिए गीता को जीवन में लाना थोडा मुश्किल प्रतीत होता है।

जहाँ कृष्ण गीता में हमें निष्काम कर्म (बिना फल पाने की इच्छा के कर्म) करने के लिए कहते हैं, वहीँ जीवन में हम छोटा सा कार्य भी अपने फायदे के लिए ही करते हैं।

कृष्ण की बातें और धर्म युक्त जीवन जीना वाकई इतना सरल न कभी रहा है और न होगा, गीता में योद्धा को भी कृष्ण को इतना समझाना पड़ता है। तो हम आम लोग धर्म को और गीता को पढने का विरोध करेंगे ही क्योंकी ऐसे में हमें बहाना मिल जाता है।

इसलिए लोगों को फिर गीता सुहाती नहीं धर्म के मार्ग पर चलने वाली कठिनाइयों, चुनौतियों को झेल पाने का उनमें साहस नहीं होता अतः फिर गीता का फायदा उन तक नहीं पहुँच पाता।

क्या धर्म अन्धविश्वास है?

अगर व्यक्ति की धर्म की परिभाषा कोई पूजा अर्चना, मान्यता बन जाए तो अन्धविश्वास है। परन्तु अगर व्यक्ति किसी को पूजने से पूर्व उनेक बारे में जानें, समझें और फिर उनको सर झुकाएं तो फिर यह अन्धविश्वास नहीं हो सकता।

उदहारण स्वरूप कृष्ण कौन, राम कौन और इनके जीवन से हम आम लोग क्या सीख सकते हैं, यह जानकार हम उन्हें पूजें तो इसे अन्धविश्वास नहीं कहा जा सकता।

देखिये कोई बेहद समझदार व्यक्ति होगा जिसने पहली बार नदी को मां कहकर उसके सामने सर झुकाया होगा, लेकिन जब लोग इस बात का अर्थ नहीं जानते की नदी को क्यों हमने माँ माना है? देवी देवता किस बात के प्रतीक है?

 फिर वो नदी में सिर्फ पुरानी मान्यताओं के अनुसार पूजा पाठ करते हैं। तमाम तरह के रीति रिवाजों का पालन करते हैं जिससे नदी दूषित होती है।

तो बिना समझे बूझे किसी चीज का अनुकरण करना फिर वह अंधविश्वास कहलाता है।

धर्म क्या नहीं है?

धर्म को प्रायः दो दृष्टि से देखा जाता है!

पहला धर्म, अलग अलग तरह के हो सकते हैं, जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,इसाई इत्यादि! और इन सभी धर्मों में आप पाएंगे कुछ विधियाँ, तौर तरीके हैं जो सभी अपनाते हैं।

जैसे निश्चित समय तक उपवास रख लेना, किसी जानवर की पूजा करना एक निश्चित तिथि के दिन पशुहत्या करना इत्यादि! इस तरह के धर्म का पालन करने पर ये विधियाँ, तौर तरीके हमें विरासत में दूसरों द्वारा मिले होते हैं।

विशेष बात यह है की आज की नयी पीढ़ी का इस तरह के धर्म से भरोसा उठ रहा है वे धर्म से दूर होते जा रहे हैं।

दूसरा धर्म को देखने का दूसरा तरीका यह है की जिस तरह सत्य मात्र एक होता है उसी तरह धर्म भी एक ही होता है, यानि यह धर्म किसी हिन्दू,मुस्लिम इत्यादि से सम्बंधित नहीं होता।

 और इस धर्म का किसी पंथ, समुदाय से कोई मतलब नहीं होता,इसे मतलब होता है सिर्फ उचित से, यानी धर्म को देखने का यह तरीका कहता है इन्सान चाहे जो भी हो इस पल, इस क्षण जो करना उसके लिए सबसे जरूरी, उचित है वही धर्म है।

जैसे कोई व्यक्ति कहता है की तुम्हारा अभी इस कार्य को करना ही धर्म है, इस संबंध में धर्म से तात्पर्य किसी विशेष जाति के लिए नहीं बल्कि उस व्यक्ति से है।

अंतिम शब्द

तो साथियों इस लेख को पढने के पश्चात धर्म क्या है? धर्म से हमें क्या सीख मिलती है? धर्म क्या होता है? धर्म क्या बिलकुल नहीं, आशा है इस लेख को पढ़कर धर्म को जान्ने में सरलता प्राप्त हुई होगी, लेख पसंद आये तो इसे शेयर करना मत भूलियेगा।

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