सत्य क्या है? अध्यात्म की दृष्टि में

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सत्य, सच्चाई जीवन जीने के लिए आवश्यक मानी जाती है, पर हर किसी के लिए सत्य की परिभाषा और अर्थ अलग अलग है, इस लेख में हम धर्म और अध्यात्म की दृष्टि से जानेंगे सत्य क्या है?

सत्य क्या है

इस भूमि पर कई ऐसे महापुरुष और ज्ञानी हुए हैं जिन्होंने सत्य की खोज और सच्चाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया। पर आम भाषा में सत्य और इमानदारी का अर्थ भिन्न होता है जबकि अध्यात्म में सत्य का अर्थ बिलकुल अलग है!

सत्य क्या है? सत्य की परिभाषा

अध्यात्म के शब्दों में “मन की वह स्तिथि जिसमें कपटता, लालच स्वार्थ नहीं होता अपितु मन स्वयं में पूर्ण हो, प्रेम से भरा हो और आत्मस्थ हो इस पूर्णता की स्तिथि को ही सत्य कहा जाता है”

अध्यात्म गहराई से हमें बाहरी या सतही तौर पर नहीं बल्कि गहराई से सच्चाई को खोजने के लिए प्रेरित करता है।

सांसारिक जीवन में सत्य से आशय आखों से देखी जाने वाली वस्तु या विषय से है, उदाहरण के लिए आपको आँखों से कोई सामान, व्यक्ति दिखा तो आप उसे वैसे ही परिभाषित करेंगे जैसा आपको दिखाई देगा।

अर्थात हम तथ्य को ही सत्य मान लेते हैं यानि अगर किसी बच्चे के पास 100 रूपये हैं और वह कहता है 100 रूपये है तो हम कहेंगे ये सच बोल रहा है क्योंकि फैक्ट ये है की उसके पास सौ रूपये है।

जबकि अध्यात्म की दृष्टि कहती है की जब भीतर का अँधेरा, झूठ हटता है सिर्फ तब तुम सत्य में स्थापित हो!

इसलिए सत्य का पता करने के लिए द्रष्टि (यानि जो दिख रहा है) और दृष्टा (देखने वाला कौन है) दोनों की बात करना आवश्यक है।

क्योंकि भले कोई व्यक्ति 100 की संख्या को सौ कहे वह सांसारिक दुनिया में तो सच्चा कहलाया जायेगा। पर अध्यात्म कहता है सौ कहने वाला कौन है? उसका सौ कहने के पीछे कौन सा उद्देश्य है? अगर उसके उत्तर के पीछे कोई स्वार्थ या लालच छिपा है तो फिर उसे सत्य नहीं कहा जा सकता।

असत्य क्या है?

मनुष्य का अहम भाव ही असत्य है, हम सभी के भीतर एक छुटपन होता है जिसे मैं कहते हैं, और इस मैं के अन्दर ही अपूर्णता होती है जो इस सांसारिक दुनिया में लगातार कुछ पाने की इच्छा रखता है, ताकि वह पूर्ण हो जाए।

इसलिए मन को असत्य कहा गया है जो लगातर इन्सान को नई- नयी चीजें पाने के लिए प्रेरित करता है। ताकि मन शांत हो सके, जबकि मन उसका इस संसार की किसी भी वस्तु या व्यक्ति से शांत नहीं होता जबकि आत्मा को सत्य कहा गया है, क्योंकि आत्मा पूर्ण है, अमर है, अविनाशी है।

पर चूँकि हम लोग अहम भाव में जीते हैं, इसलिए अपने मन की खातिर हम अच्छे बुरे कर्मों की भी ठीक से पहचान नहीं कर पाते, और मन की स्तिथि के आधार पर चलने की वजह से इस संसार में खूब रूखे सूखे से रहते हैं हर दम कुछ पाने की आस में रहते हैं।

पर मनुष्य जब अपने मन से नहीं अपितु ह्रदय यानी आत्मा से जीवन जीता है, तो फिर उसे किसी से खौफ नहीं होता, वह आनंदमयी होकर जीता है।

 लेकिन आत्मा से जीवन जीना सांसारिक लोगों के लिए आसान नहीं रहता क्योंकि इंसान हर पल अपना निजी स्वार्थ, लालच पूरा करना चाहता है अतः आत्मस्थ जीवन जीने के लिए मनुष्य को मन का विरोध सहना पड़ता है! जो लोग ऐसा नहीं कर पाते वह जीवन पर्यन्त असत्य यानी मन पर ही जीवन जीते हैं!

अहम और आत्मा में अन्तर

चूँकि हमने जाना अहम् भाव लगातार अशांत होकर कुछ पाने की इच्छा में रहता है जबकि आत्मा आनंदित है, पूर्ण है। आइये देखते हैं जो व्यक्ति अहम् भाव में और जो आत्मा में जीता है दोनों के जीवन में क्या अंतर होता है।

1. अहम् परेशान और अशांत रहता है जबकि आनंद ही आत्मा का स्वभाव है।

2. अहम् दूसरे के शोषण की भावना से काम करता है जबकि आत्मा प्रेम के भाव से।

3. इंसान अगर अहम् भाव में किसी से बातचीत करेगा तो इसलिए ताकि कोई लालच, इच्छा पूरी हो जाए। जबकि आत्मा से केन्द्रित व्यक्ति अपना प्रेम बांटने के लिए दूसरे से बात करेगा।

4. अहम् में जीने वाला व्यक्ति अपने लाभ के लिए दुसरे का भी नुकसान के लिए तैयार होता है। जबकि आत्मा में जीवन जीने वाला व्यक्ति प्रेम के खातिर नुकसान झेलने के लिए भी तैयार होगा।

5. अहम् भाव में इंसान दुसरे जीवों की हत्या करने के लिए भी तैयार रहेगा पर आत्मस्थ इंसान संवेदनशील होता है वो पशु हत्या को बिलकुल भी स्वीकार नहीं करता।

तो इस तरह देखा जाये तो आत्मा से जीने वाले व्यक्ति का मन सदा भरा रहता है, उसके मन में करुणा, प्रेम, त्याग होता है जबकि अहम भाव में जीने वाला व्यक्ति इन सुन्दर चीजों से वंचित हो जाता है!

जीवन का शाश्वत सत्य क्या है | जीवन का अंतिम सत्य क्या है?

जीवन का शाश्वत सत्य आत्मा है क्योंकि आत्मा अजर है, अमर है, अविनाशी है इसलिए हर काल में हर समय में आत्मा मौजूद है! इस पृथ्वी में,जीवन में सब कुछ समय के साथ मिट जाता है परन्तु आत्मा जिसे सबसे बड़ा सत्य भी कहा गया है वह अटल है, वह न कभी जन्मी थी न मरेगी, इंसान के शरीर और सभी भौतिक वस्तुओं का नाश होना एक दिन तय है लेकिन आत्मा सदैव है इसलिए इसे जीवन का शाश्वत सत्य कहा गया है।

सत्य की पहचान क्या है?

जब मनुष्य की कही गई बातों का स्रोत मस्तिष्क, मन न होकर अपितु हृदय होता है उसे सत्य समझा जा सकता है, इंसान के शरीर का भाग मस्तिष्क और मन दोनों ही हैं।

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 और सामान्यतया मन या बुद्धि जब भी किसी से बात करते हैं तो उसमें कोई सुख या मतलब छिपा रहता है लेकिन जब बातों का आधार प्रेम होता है यानी सत्यता के आधार पर बातें कही जाती है वह बातें सीधे हृदय से निकलती हैं!

सत्य में कैसे रहते हैं?

अपने जीवन को सत्य के प्रति समर्पित करते हुए धर्म के अनुसार जीवन जीना ही सच्चाई का प्रतीक है! इंसान सच्चा जीवन व्यतीत कर रहा है या नहीं यह उसकी आदतों, कामनाओं के आधार पर पता किया जा सकता है।

 वह इंसान जो समझें सत्य ही सुन्दर है और उस सच्चाई के खातिर जीवन में जरूरी त्याग और समर्पण करने के लिए तैयार रहे समझ जाइए वही सच्चाई का जीवन जी सकता है! ऐसी कोई विशेष विधि नहीं है जिसका पालन कर मनुष्य का जीवन सत्य या आत्मा में समाहित हो जाये!

सत्य और धर्म में क्या अंतर है?

सत्य शाश्वत है वो था है और रहेगा जबकि धर्म एक मनुष्य के लिए होता है जो उसे वह कार्य करने के लिए बाध्य करता है जो उस प्रतिपल करना सबसे आवश्यक है! सत्य को मनुष्य की गतिविधियों से कुछ फर्क नहीं पड़ता क्योंकी वो तो असीम है अनंत है।

 उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता पर धर्म मनुष्य को सही कर्म करने का सन्देश देता है! धर्म का सम्बन्ध किसी पंथ या समुदाय से नहीं होता! धर्म निरंतर मनुष्य को हर पल वह करने के लिए कहता है जिसे किया जाना जरूरी है, उदाहरण के लिए सड़क पर कोई व्यक्ति चोटिल हो गया है तो एक इंसान होने के नाते उसका फर्ज उसे हॉस्पिटल तक पहुँचाना ही उसका धर्म होता है।

अंतिम शब्द

तो साथियों इस पोस्ट को पढने के बाद आपको सत्य क्या है? इस विषय पर पूर्ण जानकारी हासिल हुई होगी। अगर सत्य के सम्बन्ध में आपके और प्रश्न हैं तो कृपया कमेन्ट में बताएं साथ ही जानकारी को सांझा करना न भूलें!

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